Sunday, December 26, 2010

दोस्त और अंजान

मन मेरा अलबेला
चाहे जग बनाऊँ दोस्त

अलबेला ये
ना जाने खेल निराले इस जग के

बन जाते सब दोस्त गर हमसफर
चाह जनत की ना होती कहीं

चन्द रोज़ साथ रह अजनबी
बन जाते हैं दोस्त

नाज़ुक जीवन की ये डोर
बदल दे दोस्ती के लम्हात

ना बस कोई चले
सोच बीते लम्हात

चाहे मन आज मेरा
बना लूँ आज उनको अजनबी
छोड़ दोस्ती की डोर जो आगे बढ़े

यह सोच
कि बने थे अजनबी एक रोज़ दोस्त 
चाहे मन मेरा अलबेला!

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