Thursday, December 16, 2010

मित्रता और व्यवसाय

आधुनिक काल में सब अपने व्यवसाय को व्यक्तित्व से जोड़ कर प्रदर्शित करते हैं. समाज, सामाजिक रीति रिवाज़, अपनापन, भाईचारा बहुत कम होता जा रहा है. और जहाँ छिट-पुट झलक देखने को मिलती भी है, वहाँ अधिकतर व्यावसायिक या व्यक्तिगत स्वार्थ रहता है.

ये सब बातें मनुष्य को झुंड का हिस्सा बनने पर भी मजबूर करती हैं. आज के समय में मनुष्य का व्यक्तित्व उसकी अकेली काबिलियत पर ही नहीं झूलता बल्कि उसकी जान पहचान कितनी है, वह किन लोगों में उठता बैठता है आदि पर भी निर्भर करता है.

एक छोटे से दिनचर्या में होने वाले व्यवहाचरण पर नज़र डालें तो हम पाएँगे की लोग व्यवसाय से अपनी पहचान जारी कर अंतता अगर समय बचे तो अपने व्यकत्तिगत गुणों या सामाजिक विषय पर रोशनी डालते हैं. इंसान आज उस स्वार्थ को पूर्ण करने में अग्रिम रहता है जिसे वो परिकल्पित कर अपने भविषय को हवामहल बनाता है.

एक बात गौर करने लायक यह भी है की इंसान व्यावसायिक लाभों में बाधा पड़ने के डर से वही पहलू यथार्थ करता है जो प्रत्यक्ष खड़े व्यक्ति को अच्छे लगें. व्यावसायिक दौड़ ने आज के दौर में मित्रता को विभाजित कर व्यावसायिक मित्रता को अभूतपूर्व बना दिया है. जिस मित्रता के शुरुआत में ही व्यावसाय जुड़ा हो उसका सत्यार्थ आप खुद ही समझ सकते हैं. ना जाने कितने मॅट-मएले कण रहते हैं इस व्यावसायिक मित्रता में कि आपका साथी एक कदम भी आप से आगे हुआ और हानि-लाभ की शृंखला व पीछे छूट जाने का डर शुरू हुआ.

कई बार तो बहुत अच्छे मित्र भी व्यावसायिक मित्रता का शिकार हो साथ बिताए सुनहरे पलों को भुला देते हैं. इसी की बदौलत यह आज एक आम सा दृश्य बन गया है की जिन लोगों को आप आज साथ देखते हैं उनमें कुछ हफ्तों या महीनों में कोसों की दूरी हो जातीं है.

खेर दूरियाँ तो मिलती हैं और मिलेंगी भी 
पर मीलों साथ चलने का वादा है ए दोस्त
सदीयाँ भी कम हैं जीने को गर साथ तेरा हमायशगी का हुआ!!

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