Thursday, December 30, 2010

शुभकामनाएँ नव वर्ष की

सुबह की महक मेरे तन-मन को महकाए
इस महक में बीती हुई शाम याद आए

मह में डूब मुकम्मल हुआ जहान
दो प्यालों भरी ज़िंदगी लगने मह लगी

आनंद में विभोर प्रसन्नचित हो उठा ये मन
याद बीते पलों में सब आने लगे

चाहत हुई बन प्याला
भर दूं रंग खुशियों के

यकीन है खुशियों भरे हो जाएँगे जीवन सबके
खुशी जिनको याद कर ये विचार इस मह-दीवान के अंतर्मन में आया है!

Sunday, December 26, 2010

दोस्त और अंजान

मन मेरा अलबेला
चाहे जग बनाऊँ दोस्त

अलबेला ये
ना जाने खेल निराले इस जग के

बन जाते सब दोस्त गर हमसफर
चाह जनत की ना होती कहीं

चन्द रोज़ साथ रह अजनबी
बन जाते हैं दोस्त

नाज़ुक जीवन की ये डोर
बदल दे दोस्ती के लम्हात

ना बस कोई चले
सोच बीते लम्हात

चाहे मन आज मेरा
बना लूँ आज उनको अजनबी
छोड़ दोस्ती की डोर जो आगे बढ़े

यह सोच
कि बने थे अजनबी एक रोज़ दोस्त 
चाहे मन मेरा अलबेला!

Tuesday, December 21, 2010

नूर

 उस चेहरे में इक नूर है
ओरों के लिए वो इक फतुर है

मेरे खुदा का वो इक हूर है
बेपरवाही सी छाई इस दूनिया में

हर नक्श पर तलाश है
दिखती उस चेहरे पर ज़िंदगी की रौनक भरपूर है!

Monday, December 20, 2010

मासूमियत-ए-बचपन

मासूमियत तेरी छीने
लगे, आज ये अलहड़पन

हर दिखावे से लगे दूर तेरा ये बचपन
चादर से ढका हर अल्हड़, चाहे चादर चढ़े ये बचपन

मिश्रित-विकृत अल्हड़ रोके आज़ाद बचपन
आप को गवा बना अल्हड़ आज गवाना चाहे ये मासूम बचपन

छलकाना चाहे कड़वी धारा अल्हड़
हर ठोर पर रेडे लगाए ये अलहड़पन

पर रहे मधुर-मुक्त, तो पा जाएगा मंज़िल अपनी ये बचपन
उमीद कहूँ या अधूरी कल्पना पा जाएगा वो स्वर्ग 'आज़ादी' में ये बचपन!

Sunday, December 19, 2010

Reviving wanderlust in wilderness

Vagaries and complexities drove me insane
Search of vast and sane brought me to village lane

Vast and Sane away from city lanes
Lie afresh in this wilderness

Green embraced me in her bosom
Landed in nature once again

Everything died but soul came to life
Such was the beauty of wilderness

Started to dream an unknown existence
Wanderlust held captive unleashed the wanderer in me insane!

Saturday, December 18, 2010

आज फिर तुम याद आए

महका समा थम सा गया
हर महक में ना जाने क्यों में बहक सा गया

एतबार था उस सौंधी खुश्बू का
शायद इसलिए हर बार तुम याद आए

रवानगी में दीवानगी है
महसूस होगा महक में खो जाओंगा 

सदियों का सफ़र तय जो किया
उस सफ़र को तुम आज फिर याद आए

मंज़िल थे मेरी तुम और में रास्ता
खो गया जो मुसाफिर 'मुझे' आज फिर तुम याद आए!

Friday, December 17, 2010

एहसास

पलों में मिले पर हर खोए को इख्तियर कर जाए


ना मिले तो जीवन ठहर जाए

पर मिल जाए तो जीवन की हर डोर खिंच जाए


काश आने से जाने का लम्हा उन हसीन वादियों में कट जाए

भागे को छोड़े का एहसास हो तो दुनिया एक हो जाए


शहरों में अदाय्गि ना मिले तो वादियों में बिताए हसीन पलों का एहसास हो जाए!

हरियाली की चाहत

हरियाली की चाहत हर ज़मीन की
पर मेरी चाहत ज़मीन में हरियाली आने की

हरियाली का असवादन वो मनायें
मेरी चाहत हरियाली लाने की

वन वन भटकता-चहकता मैं
जब लौटू इस मानुष धरती पर
चाहत इस धरती को वन बनाने की!!

Thursday, December 16, 2010

ਜਿਗਰ ਦਾ ਸਚ

ਹਰ ਸਚ ਵਿਚ ਫਤੂਰ ਹੀ ਬੰਦਾ ਬੂਣੀਯਾਦ ਉਸਦੀ
ਆਜ਼ਮਾਨ ਦਾ ਮਜ਼ਾ ਸ਼ਾਯਦ ਜੀਂਨ ਵਿਚ ਨੀਂ

ਦਸਤੂਰੇ ਕਿਸਮਤ ਸੀ ਮਿਲਦੀ ਸ਼ੇਹ ਹਰ ਉਸ ਪਰਿੰਦੇ ਨੂ ਉਚੀ ਉਦਾਰ ਦੇ ਥ੍ਲੇ
 ਕਾਯਲ ਫਿਰ ਵੀ ਓ ਇਸ ਗੁਲਾਮ ਨੂ ਕਰ ਦਿੰਦਾ ਆਪਣੇ ਜਿਗਰ ਨਾਲ

ਜਿਗਰ ਨਾ ਹੋਂਡਾ, ਨਾ ਹੋਂਦੇ ਜਿੰਦਡੀ ਵਿਚ ਬਤਾਏ ਹੋਏ ਓ ਹਸੀਨ ਲਮਹੇ!

मित्रता और व्यवसाय

आधुनिक काल में सब अपने व्यवसाय को व्यक्तित्व से जोड़ कर प्रदर्शित करते हैं. समाज, सामाजिक रीति रिवाज़, अपनापन, भाईचारा बहुत कम होता जा रहा है. और जहाँ छिट-पुट झलक देखने को मिलती भी है, वहाँ अधिकतर व्यावसायिक या व्यक्तिगत स्वार्थ रहता है.

ये सब बातें मनुष्य को झुंड का हिस्सा बनने पर भी मजबूर करती हैं. आज के समय में मनुष्य का व्यक्तित्व उसकी अकेली काबिलियत पर ही नहीं झूलता बल्कि उसकी जान पहचान कितनी है, वह किन लोगों में उठता बैठता है आदि पर भी निर्भर करता है.

एक छोटे से दिनचर्या में होने वाले व्यवहाचरण पर नज़र डालें तो हम पाएँगे की लोग व्यवसाय से अपनी पहचान जारी कर अंतता अगर समय बचे तो अपने व्यकत्तिगत गुणों या सामाजिक विषय पर रोशनी डालते हैं. इंसान आज उस स्वार्थ को पूर्ण करने में अग्रिम रहता है जिसे वो परिकल्पित कर अपने भविषय को हवामहल बनाता है.

एक बात गौर करने लायक यह भी है की इंसान व्यावसायिक लाभों में बाधा पड़ने के डर से वही पहलू यथार्थ करता है जो प्रत्यक्ष खड़े व्यक्ति को अच्छे लगें. व्यावसायिक दौड़ ने आज के दौर में मित्रता को विभाजित कर व्यावसायिक मित्रता को अभूतपूर्व बना दिया है. जिस मित्रता के शुरुआत में ही व्यावसाय जुड़ा हो उसका सत्यार्थ आप खुद ही समझ सकते हैं. ना जाने कितने मॅट-मएले कण रहते हैं इस व्यावसायिक मित्रता में कि आपका साथी एक कदम भी आप से आगे हुआ और हानि-लाभ की शृंखला व पीछे छूट जाने का डर शुरू हुआ.

कई बार तो बहुत अच्छे मित्र भी व्यावसायिक मित्रता का शिकार हो साथ बिताए सुनहरे पलों को भुला देते हैं. इसी की बदौलत यह आज एक आम सा दृश्य बन गया है की जिन लोगों को आप आज साथ देखते हैं उनमें कुछ हफ्तों या महीनों में कोसों की दूरी हो जातीं है.

खेर दूरियाँ तो मिलती हैं और मिलेंगी भी 
पर मीलों साथ चलने का वादा है ए दोस्त
सदीयाँ भी कम हैं जीने को गर साथ तेरा हमायशगी का हुआ!!