Monday, December 20, 2010

मासूमियत-ए-बचपन

मासूमियत तेरी छीने
लगे, आज ये अलहड़पन

हर दिखावे से लगे दूर तेरा ये बचपन
चादर से ढका हर अल्हड़, चाहे चादर चढ़े ये बचपन

मिश्रित-विकृत अल्हड़ रोके आज़ाद बचपन
आप को गवा बना अल्हड़ आज गवाना चाहे ये मासूम बचपन

छलकाना चाहे कड़वी धारा अल्हड़
हर ठोर पर रेडे लगाए ये अलहड़पन

पर रहे मधुर-मुक्त, तो पा जाएगा मंज़िल अपनी ये बचपन
उमीद कहूँ या अधूरी कल्पना पा जाएगा वो स्वर्ग 'आज़ादी' में ये बचपन!

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