महका समा थम सा गया
हर महक में ना जाने क्यों में बहक सा गया
एतबार था उस सौंधी खुश्बू का
शायद इसलिए हर बार तुम याद आए
रवानगी में दीवानगी है
महसूस होगा महक में खो जाओंगा
सदियों का सफ़र तय जो किया
उस सफ़र को तुम आज फिर याद आए
मंज़िल थे मेरी तुम और में रास्ता
खो गया जो मुसाफिर 'मुझे' आज फिर तुम याद आए!
No comments:
Post a Comment