भरी थी इक दिन वादियों से ये 'उड़ान'
था नया हर मंज़र और हर पड़ाव अंजान
शुरूवाती वो पल, बीते डर में
सहम कर मुड़ जाता पीछे
याद आते सपने उन आँखों ने जो देखे
सहारे इस याद के हर कदम मुड़ जाता
चलने लगता मैं आगे
सीख कुछ नया हर मंज़िल पर
तय कर फ़ासले
बन गया नाभिक आज ये पंछी
खुशी थी अब हर 'उड़ान' में
जीना हर रह पर बना अब दस्तूर
कल्पना की थी जिसकी मासूम उस बचपन में
परिभाषित आज कर ली वो 'उड़ान'
द्विवेदना सा जीवन
इक ओर साथी दूसरा छोर 'उड़ान'
जी आज फिर बोले इस हिमवसी का
भर लूँ हसीन इन वादियों में 'आख़िरी उड़ान'!