Saturday, April 2, 2011

जश्न ?


कल रात जश्न में डूबा भारत नयी रोशनी में चुन्धिया रहा था. खुशी में डूबे हम जाने-अंजाने सब से गले मिल रहे थे. इतनी खुशी, लगा, की ज़ाहिर करने पूरा हिंदोस्ताँ सड़कों पे उतार आया. खुशी के इस अवसर पर अचानक नज़र पड़ी फूटपाथ पर लेटे उन लोगों पर. खुशी उन चेहरों पर भी दिखी. पहली बार, शायद, उन्हें गले लगा रहा था. वो अपने से लगे. उनमें से एक बच्चा पूछने लगा भैया, 'सुन रहे हैं इंडिया जीत गया है, हमको बहुत खुशी है'. उस नन्हे के ये शब्द जैसे मेरी अंतरात्मा को छू गये. जश्न की खुशी अभी बाकी थी पर घर लौटते हुए ये सवाल आया - क्या हम उनके दुख में भी कभी इस तरह शरीक हुए जैसे की वो हुमारी खुशियों में आज और शायद हमेशा होते हैं?

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